फुंसी, फोड़ा बन जाता है,
फिर, फोड़ा तन जाता है!
भरता है, फिर, मवाद,
फिर उठती है, उसमे, दाद!
स्वयं ही, फोड़ा बह जाता है,
दुःख दर्द का पहाड़, ढह जाता है!
प्रकृति प्रदत्त हल ही है, उचित,
सारे, कष्ट है, प्रारब्ध, रचित!
विपदा एक दिन, चली जानी है,
इस जीवन की बस, यही कहानी है!