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दस्तूर

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शाख से टूटे पत्ते की मानिंद है, हम
        
                                                    
                            
जुड़ेंगे नहीं फिर, पर कोई नही ग़म,

जब तक शाख के साथ रहे,
लगाते रहे कहकहे,
कई यादें, कई वादें,
कई किस्से हैं, अनकहे,

सहलाते रहे, बहलाते रहे
धूप और बारिश से बचाते रहे,

टूट कर गिरे भी, तो दुआ दी
अपनी जगह, नए कोंपलों को जगह दी,

बस इतना ही था, शाख से रिश्ता मेरा
अब उसके कदमों में है, मेरा बसेरा,

हवाएं आएंगी ले जाएंगी, कहीं दूर
क्या करें कि यही है, जिंदगी का दस्तूर।
एक वर्ष पहले
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Rabindra Aman

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