कुछ सवाल होंठों तक आकर ठहर जाते हैं
जवाब जानते हुए भी लोग खामोश रह जाते हैं।
सच की राह में अक्सर तन्हाई मिलती है
झूठ की महफ़िल में हर बात सही लगती है।
जाति के तराज़ू में इंसान तौला जाता है,
दहेज के बाज़ार में रिश्ता बेचा जाता है।
शिक्षा के दीप जलाने की बातें हज़ार हैं,
पर गरीब के हिस्से में अधूरे सपने हज़ार हैं।
धर्म के नाम पर दीवारें उठाई जाती हैं,
इंसानियत की आवाज़ें दबाई जाती हैं।
सच बोलने पर रिश्ते बदल जाते हैं,
गलत के सामने अपने भी चुप रह जाते हैं।
कब तक जाति-धर्म में इंसान बँटता रहेगा
कब तक अन्याय देखकर समाज चुप रहेगा?
कब तक बदलाव की उम्मीद दूसरों से करेंगे,
कब तक अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह फेरेंगे?
याद रखना, समाज की सबसे बड़ी हार यही होती है,
जब बुराई के सामने अच्छाई खामोश होती है।
मैं लिख रहा हूँ उन सवालों की कहानी,
जिन्हें दबा देती है दुनिया पुरानी,
मेरा उद्देश्य नफ़रत नहीं, सोच जगाना है,
बुझते हुए ज़मीर में उम्मीद जलाना है।
बदलाव न शिकायतों से, न भाषणों से आएगा,
जब कोई सच के साथ खड़ा होगा, तभी समाज बदल पाएगा।