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कविता

Manish Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी लगता है कि क्यों कोई लिखे
        
                                                    
                            
पर लिखे पर बस किसी का क्या कोई चले

जिंदगी जितनी व्यावहारिक हुई
कविताएं जिंदगी से मानो रुखसत हो गई

आंकड़े लिखने और गिनने में जिंदगी खप गई
अब भावनाओं को चढ़ना - उतरना,
घटना-बढ़ना थम सा गया

पर अचानक, गाहे-बगाहे, यादों का धुंध
आंख तर कर ही जाता है, लम्हों में लौटकर

न लौटने वाले को, यादों की रस्सी खींच लाती है
बीते हुए लम्हों की यादें,
लबों पर मुस्कान आंखों में पानी ला ही देता है

और फिर भावनाएं कविता बन उभर आती हैं जहन में
जैसे मशीन होती जिंदगी में कोई एहसास
आदमी को आदमियत सिखा सी जाती है
-मनीष 'मनु'
2 महीने पहले
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