इंसान बेकार फिक्र करता,
ना दुख ठहरता ना सुख ठहरता,
यही है जीवन की महानता,
अटल और सत्य वास्तविकता,
ना दुख ठहरता न सुख ठहरता।
दुख में कभी टूटना नहीं,
सुख में कभी उछलना नहीं,
जोभी दिन आए खुशी से जीना
रहना यहां हमेशा नहीं।
क्या फर्क पड़ता है क्या मिला,
किसको यहां सब मिलता है।
सब मिल भी जाए तो किसका,
यहां मन भरता है।
कुछ कर्म निस्वार्थ भी करें,
इस सृष्टि में हमें भी बहुत,
कुछ मुफ्त मिला है।
धरती मां ने अपनी गोद दिए,
दिनकर मुफ्त प्रकाश देते हैं।
प्रकृति हवा, पानी छायादार वृक्ष
फूल, फल मनमोहक दृश्य,
अपनी बहुमूल्य सम्पत्ति प्यार,
जरूरत की अनिवार्य सभी,
वस्तुएं देती है।
जो भी मिला अच्छा मिला,
ईश्वर से क्या गिला है।
जन्म मानव रूप में मिला,
यही क्या कम है।
हम हंसते और मुस्कुराते रहें,
ताकि, देख के लोग भी प्रसन्न रहें।