दिवाकर निशा को चीरते हुए
जब धरा पर प्रकाश बिखरते हैं
जन-जन के जीवन में पुनः हर्ष उल्लास भरते हैं
मन की बगिया में फूल खुशी के खिलते हैं
जब लालिमा लिए सर्वत्र उजाले करते हैं
दिल का आलम पल में यूं बदलते हैं
जैसे सूने मन के आंगन में राग कोई बजते हैं
धरा के तिमिर पल में यूं छटते हैं
तेज रोशनी से जगमग उजियारे होते हैं
दिवाकर दिल के घने अंधेरे को जब हरते हैं
अद्भुत मन में प्रकाश उज्ज्वलित होते हैं।।
-ममता तिवारी