काजल का,
टीका लगाकर--
मां सभी,
गमों से बचा लेती--
मिलती है,
ऐसी दुकानों में--
कोई जड़ी बूटी।
चांद को,
दिखाकर,
खाना खिलाना--
सुबह की लालिमा--
दिखाकर,
रोते चेहरे को हंसाना--
आती है किसी को,
ऐसी इल्म और विधि।
नामुमकिन है,
किसी का मां जैसा--
तजुर्बा पाना--
मां जैसा,
प्यार लुटाना--
मां के पास है,
एक गजब--
और अलग नीति।
नहीं जानती,
क्या अच्छा--
क्या बुरा है,
उनका संपूर्ण जीवन--
बच्चों से ही पूरा है।
ना कोई,
खुशियां मांगती--
ना कभी,
अपने मन की,
सुनती--
दया की,
सागर--
प्रेम की मूरत--
हर वक्त,
अपनों की,
ख्यालें बुनती--
कहां किसी,
हकीम वैद की दवा--
मां के आगे,
सुनती................।।
-ममता तिवारी