चंचल चुलबुल थोड़ी
जिद्दी थोड़ी मै भोली
भाली थी आसमान
में उड़ने की मै बहुत
दीवानी थी पंखों पर
अटूट विश्वास था
हौसले भी बुलंद थे
नहीं किसी का फिक्र था
सपने भी स्वच्छंद थे
हर तरफ़ बसंत थे
मन में भी उमंग थे
वीरो की गाथाएं सुनने
के बड़े शौक थे वो भी
क्या दौड़ थे हम सब
आसमान की परियों
के दीवाने थे वो भी क्या
ज़माने थे केवल खिलौने
भाते थे माता पिता के
भाई बहन के प्यार से
चेहरे खिल जाते थे वो
भी दिन बड़े सुहाने थे
खूबसूरत बचपन के ज़माने
थे काम केवल हंसना और
हंसाने थे दादी नानी के
किस्से कहानियों के बड़े
दीवाने थे