कभी गुस्सा, कभी डांट तो कभी मुस्कुराती हो,
चाँद नहीं हो फिर भी मुझे रोशन कर जाती हो,
अंधेरों में जुगनू बन रास्ता दिखाती हो,
मम्मा, आप इतना सब कैसे कर पाती हो?
कभी टीचर, कभी बहिन तो कभी दोस्त बन जाती हो,
कभी सेफ तो कभी डॉक्टर के सांचे में ढल जाती हो,
मुझे जब, जिसकी जरूरत हो आप वही बन जाती हो,
आप असल में क्या हो? मुझे समझ क्यूं नहीं आती हो?
अगर आप एक होती तो कुछ लिख भी पाती,
आप तो एक में अनेक हो, तो किसी को क्या और कैसे बताती?
आप सच में क्या हो? काश.... मैं ये बता पाती
अब और क्या ही लिखूं आप पर?
इतनी तो मुझे हिन्दी भी नहीं आती