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अपनी कमी को

mamta singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सारे जग की पीड़ा अपने उर में समेट कर,
        
                                                    
                            
ये आंसू रोते हैं अक्सर तन्हाई में बैठ कर।
दिल तुम्हारी गलतियों को माफ़ कर देता है,
अपनी कमी को वक्त के माथे पे मढ़ कर।
एक वर्ष पहले
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kamal jha

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