अपने आप से लड़ते लड़ते
कितना तन्हा वीरान है दिल
ढूंढ रही हूँ जिसको मैं
ना जाने कब मिलेगी मन्ज़िल
चैन नही आता उसको जो
तड़प रही है अंदर रूह
इस टूटी नैया को क्यों
मिलता नही कोई भी साहिल
खत्म कर दे जो गम - ए-दिल को
कहाँ है वह ऐसा कातिल।
- ममता खुराना