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दहेज प्रथा

Mamta Kanaujia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अक्सर हम ही बनाते हैं कुछ प्रथाओं को
        
                                                    
                            
दहेज ही वो प्रथा है जिसने निगला कई कन्याओं को।

बेटी है वो कोई वस्तु नहीं
जिसे बेचकर खरीदा है,
दो परिवारों का मिलन है
होता, नहीं कोई ये सौदा है।

कितनी सौगातें लेकर बेटी,
बहू बनकर आती है
मान सम्मान उतना ही दो
उसको
जितना वो अपने घर पर पाती है।

लगाकर बोली अपने बेटे की
तुमने विवाह का अपमान किया
लेनदेन की बातें करके इक
दूजे को कहां मान दिया।

बेटी की खुशियों की खातिर
माता-पिता अपनी
खुशियां दांव पर लगाते हैं
अच्छा घर वर मिलेगा उसको
सपने यही सजाते हैं।

इस दहेज ने ही बेटी की जगह
बेटों की चाह बढ़ाई है
क्योंकि बेटी को देना पड़ता है
और बेटों से होती कमाई है।

उपहार की कहानी खत्म हुई
दहेज का विकराल रूप अब छाया है
छोटी सी बिटिया के जीवन में
यह दानव बनकर आया है।

दहेज के लालच में पड़कर
मिट जाती
नारी की कहानी है,
जाने कब मिटेगी यह प्रथा
हो गई बहुत पुरानी है।

- ममता कनौजिया
2 वर्ष पहले
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