विज्ञापन

ग़ज़ल

Mamta Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आप जब से मेरी ज़िंदगी से गए
        
                                                    
                            
यूँ लगा जैसे हम रौशनी से गए

दिल के अरमां पिघलते रहे रात भर
हिज्र में हम तुम्हारे ख़ुशी से गए

देख कर बेसबब आपकी बेरुख़ी
यूँ लगा जीते जी ज़िन्दगी से गए

रिश्त-ए-इश्क़ क्या तुम ने तोड़ा सनम
आह लब मेरे देखो हँसी से गए

कितने नाज़ों से सौपा था दिल आपको
दिल ये क्यूँ तोड़ कर बेदिली से गए

पीछे पीछे गए फिर भी पाया नहीं
आप आए भी तो किस गली से गए

आतिश-ए-अश्क़ नें यूँ भिगोया की हम
वस्ल के कैफ़ और बेख़ुदी से गए

क़द्रथी कब तुझे मेरे जज़्बात की
बेवफ़ा जा तेरी ज़िंदगी से गए

चाँद चिलमन में शब भर यूँ ढलता रहा
हसरत-ए दीद की हम ख़ुशी से गए

क्या तअज्जुब कि ऐ "नाज़" इस बार भी
यअनी हम सुब्ह तक रौशनी से गए
-ममता गुप्ता नाज़
 
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

kamal jha

90 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10991 कविताएं

View Profile