जैसे ही उतरती है धूप,
जाड़े की ,हर सुबह मेरे आँगन में
आम के पेड़ के पत्तों से छन के ,
उस सुनहरी मुलायम एहसास से
रोम रोम पुलकित हो उठता है
स्वयं बज उठते तार मेरे मन के l
पत्ते पेड़ के करने लगते हैं आपस में
हिल हिल के सरगोशियां..
शामिल मुझे भी कर लेते महफिल में
चुरा कर मेरी ख़ामोशिया
चिड़िया, गिलहरी भी हमारी
बातों का लुत्फ़ उठाते हैं
बीच बीच में थोड़ा हाँ..उछल कूद मचाते हैं
वैसे तो हम सुबह के चंद घंटे
रोज़ इसी तरह बिताते हैं
पर.....
पर आज अचानक धूप ने
पेड़ की टहनियों को सहलाते हुए
मुझसे पूछा...एक बात बोलूँ,
बुरा तो नहीं मानेगी आप...
मैंने अपनी स्वेटर के बटन खोलते हुए
सुनहरी धूप के मन को थोड़ा टटोलते हुए, कहा...
कहो मेरी जान...बेफ़िक्र होकर पूछो
धूप ने कुछ दबी आवाज़ में कहा,
" गर्मियों में कोई मेरा चेहरा नहीं
देखना चाहता और जाड़े में
सब यहाँ मेरा आंखें बिछाए
इंतज़ार करते हैं, ऐसा क्यूँ?"
तो अचानक मन ही मन मुझे
अपनी इंसानी फ़ितरत कचोटती
नजर आयी.....हमारी दुनियां में
यही रिवाज है भाई....
ज़रूरत है अगर, तो स्वागत करते सब
पलकें बिछा कर...
जरूरत ना हो, तो दरवाजा पटक दो
कुछ बुदबुदा कर...
पता नहीं मेरे अंतर्मन की बात
उस सुनहरी धूप ने कैसे पढ़ ली...
अपने चमचमाते आंचल को पूरा फैलाकर
सबके बदन से कंपकंपी हर ली. ...
-ममता ग्रोवर