सच क्या है?
वो जो मुझे पता है,
या वो… जिसे सामने वाला सच मान रहा है?
लिखी हुई बातें और बोले हुए झूठ,
एक दिन सच हो जाते हैं।
पर क्या वो सच होते हैं,
या बस सच का नक़ाब पहन लेते हैं?
एक झूठ को सौ बार दोहराओ,
तो लोग उसे सच मान लेते हैं।
पर जो सच है,
फिर उसका क्या होता है?
सच और झूठ बताने वाला कौन है?
सच बोलने वाला कौन है?
झूठ बोलने वाला कौन है?
सच को झूठ
और झूठ को सच मानने वाला कौन है?
या कोई है ही नहीं…
या हम खुद ही हैं।
और अगर हम ही हैं,
तो फिर कैसे
किसी का झूठ सच बन जाता है,
और किसी का सच… झूठ?
सच वही है जो सबको दिखता है?
या वो…
जो अकेले में महसूस होता है?
सच आवाज़ में होता है,
या ख़ामोशी में छुपा रहता है?
अगर हर इंसान का सच अलग है,
तो फिर असली सच कौन सा है?
कहते हैं,
झूठ पर दुनिया कायम है…
फिर सच का क्या काम?
कौन है सच?
क्या मैं सच हूँ?
या तुम सच हो?
या कोई और सच है,
जो कहीं छिपकर बैठा है…
कौन है सच?
और ये कहाँ रहता है?