न तो कृष्ण का द्वापर है यह, न ही राम का त्रेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
यह कलयुग का लोकतंत्र है
यहां सभी कुछ बिकता।
सिद्धान्तों आदर्शों पर अब
कोई यहां न टिकता।।
अंधा बांट रहा है रेवड़ी, फिर फिर खुद को देता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
कहें कहां तक, न्याय नीति की
बात न सुनता कोई।
अनाचार अत्याचारों की
फसल जा रही बोई।।
दोषी को दंडित करने का, श्रेय न कोई लेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
नित नकली चाणक्य देश को
बातों में बहलाते।
राजमार्ग पहली बारिश में
स्वीमिंगपूल बन जाते।।
हजम करोड़ों कर जाते हैं, योगक्षेम के चेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
लोकतंत्र नित भ्रष्टतंत्र में
परिणत होता जाता।
नेता नौकरशाह निरन्तर
नीयत बेच कमाता।।
नाव डूबने वाली है जो, उसे लुटेरा खेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
मंदिर भी अब असुरक्षित हैं
वहां पड़ रहा डाका।
हर डकैत अपने बचाव का
खींच चुका है खाका।।
न्यायी न्याय नहीं करते अब, बन परिवार प्रणेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
'स्वर्गादपि गरीयसी भारत'
इसकी आन बचाएं।
अब प्रश्रय न लुटेरों को दें
आओ अलख जगाएं।।
विक्रेता को सबक सिखाएं, बचे न कोई क्रेता।
सत्ता सुख के लिए थोक में, बिक जाते हैं नेता।।
-महेश चन्द्र त्रिपाठी