विज्ञापन

निर्मम चाँद

Mahesh Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल रात
        
                                                    
                            
रिम-झिम बरसात हुई।

बहुत सी यादें ताज़ा हुई
बहुत से वादे याद आए
किसी की बहुत याद आयी।

नींद आँखों से दूर थी
उतनी ही
जितनी दूर चाँद।

खिड़की के झीने पर्दे से
झाँकता था।

मैंने देखा है
उसे मुस्कुराते हुए
मेरी बेबसी पर।

यदा-कदा,
जब भी वह इधर से गुज़रता है
मुझसे नज़रें मिलाता है
आँखें लड़ाता है।

मैं नज़र चुराता हूँ।
वह,
शातिर खिलाड़ी की तरह
जगह बदल कर
फिर सामने आ जाता है।

चाँद के रूप में
यह
कहीं तुम तो नहीं?
खो गए थे तुम भी तो
इन बादलों में - इस निर्मम चाँद की तरह।
-महेश बजाज
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6854 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile