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वानप्रस्थ

Madhav Krishna

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बढ़ न पाया दो कदम भी, फँस गया था जाम में
        
                                                    
                            
छोड़कर यूँ ही चला जब बुलाया श्री राम ने

दोपहर थी, भूख भर
खाया पिया, फिर सो गया
नींद अब जब से खुली है
न जाने! क्या हो गया?
नरम भी है गरम भी है
बड़ा सा बेहया बिछौना
बहुत खेला खेल सारे
अब नहीं भाता खिलौना

जान अपनी डाल दी थी कबूतर की जान में
स्वयं कठपुतली बना जलता रहा शमशान में

बात कल की है कि मुझ पर
थूक कर गाड़ी बढ़ी थी
भींच ली थीं मुट्ठियाँ
आवेश में त्यौरी चढ़ी थी
ठीक है सौदा जगत का
खेल में अड़चन नहीं है
पर मुझे विश्राम दो, अब
खेलने का मन नहीं है

खेल ही तो चल रहा है धन मकान दुकान में
नशा तो हर तरफ है यौवन सुरा में पान में

हां! बदलना चाहता था
घर बगल संसार को
छीन लेना चाहता था
सफलता धन प्यार को
गल गए हिटलर मुगल
चंगेज़ से सम्राट भी
अन्त में रह गयी उनकी
भूख धरती चाटती

आचरण से बड़ा प्रवचन छिपा है किस ज्ञान में
एक ही गोबर मिला सम्मान में अपमान में

क्या हुआ जो छप गयीं
दो पंक्तियाँ अखबार में
दोस्त! अब भी बंद हो तुम
खुले कारागार में
बात यह है, हथकड़ी
हर बार दिखती भी नहीं है
और नीयत वासना
कोशिश करो, छिपती नहीं है

क्या मिला अब तक हिलाकर जीभ व्यर्थ बखान में
माँस खाने के लिए चढ़ गया ऊँच मचान में

हम लड़ें हर बार जीतें
जरूरी बिल्कुल नहीं है
छोड़ देना रण, पलायन
कभी, कायरता नहीं है
हर समय हो युद्ध केवल
शान्ति फिर कैसे मिलेगी
सर्पिणी इस नाल से
उस नाल तक कैसे खिलेगी

क्यों हिचकता पार्थ अब? मत चूक! शर सन्धान में
कामना की स्वर्ण लंका जलायी हनुमान ने

समय कम है, लौटना है
महासागर लांघना है
राम बैठे प्रतीक्षारत
राम को ही साधना है
विभीषण से भेद पाकर भी
तुझे क्यों उलझना है
मेघनादी बेड़ियों में
और कब तक झुलसना है

दे दिया संदेश, मुड़कर लौट अपने धाम में
छोड़कर सब चल! बुलाया है प्रभू श्रीराम ने

 
12 घंटे पहले
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