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मेरी तिजहारिन

Madhav Krishna

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी तिजहारिन!
        
                                                    
                            

तुमने कहा:
"अगले जन्म में तुम पत्नी बनना और मैं पति!"
और मैं सहम गया।

कहाँ से लाऊँगा वह धैर्य?
जो तुममें है,
घर और बाहर की नौकरी दिन रात बिना शिकायत!

यह तो तुम हो जिसने नौकरी को भी प्रेम बना दिया;
कॉलेज जाने से पहले सबके कौर,
सबकी दवा और आने तक की नसीहतों की सूची।

और मैं यह भी जानता हूं कि,
पुरुष प्रधान समाज में नौकरी करने की क्या क्या समस्याएं हैं?
पुरुष कहां स्वीकार कर पाता है समकक्ष स्त्री को भी!

पर तुम्हारा हंसते हुए घर में घुसना भी कितनी आश्वस्ति देता है!
कि तुमने कक्षाएं ली होंगी,
सुना होगा और बढ़ चली होगी आगे।

और यकीन मानो!
तुम्हारे न रहने से यहाँ घर में कोई अंतर नहीं पड़ता।
सब तो रहते ही हैं।

पापा टीवी पर मोदी जी को निहारते रहते हैं,
अम्मा मोबाइल पर देवी के गीत सुनती हैं,
बच्चे अपनी अपनी दुनिया में; और मैं कक्षाओं में बच्चों के बीच।

खाना भी पड़ा रहता है बर्तन में,
और गैस चूल्हे में।
लेकिन एक अजीब सा सन्नाटा रहता है इन आवाजों के बीच।

वही घर बस घर नहीं रहता।।

जिसमें तुम्हारे आते ही हलचल मच जाती है,
जैसे ग्रहों को नाचने के लिए सूरज मिल गया हो,
जैसे वीणा में कई तार एक साथ छेड़ दिए हों तुमने।

सब की फरमाइशें शुरू हो जाती हैं,
सब खाने लगते हैं गरम गरम,
बतियाने लगते हैं, और तुम देखती रहती हो सब कुछ हंसते हंसते।

मैं बड़ा हो रहा था, हो भी गया था,
लेकिन एक दिन, अचानक तुम मेरे जीवन में आयी,
और मैं बच्चा बन गया फिर से।

क्या ऐसा सबके साथ होता है?
हाँ! बूढ़ों को बच्चा बना देने,
और इतने बच्चों को एक साथ पालने का हुनर भी बस स्त्री में ही है।

तुम्हारी खुशी भी किसमें है?
थककर दो घड़ी आराम करते समय बच्चों के बीच दबने में,
उनकी शिकायतों में और नयी नयी माँगों में।

और मुझसे तो तुमने कुछ मांगा ही नहीं मेरे सिवा कभी भी!
उल्टा मेरे लिए ही मांगती रहती हो हरितालिका तीज पर,
भगवान से, हर साल हर बार, बस मौका चाहिए।

औरत के निष्काम प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि,
वह सबसे अधिक प्रसन्न तभी होती है
जब उसे कोई अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीष देता है।

क्या तुम्हारे अपने जीवन का तुम्हारी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं?
या तुमने मेरे जीवन में ही मिला दिया है अपना जीवन कुछ यूं
कि तुम खोजने पर भी अपना जीवन मुझसे अलग नहीं खोज पाती?

सुनो! तुम जो कहोगी, मैं करूंगा!
लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि पत्नी बनकर तुम्हारे साथ वह न्याय न कर सकूंगा,
जो तुम अनायास करती हो!

पूर्ण ईश्वर की पहली कृति स्त्री ही है, जानता हूं,
तभी वह इतनी पूर्ण है!
इतनी निरपेक्ष, इतनी निष्काम और प्रेम से भरी!

और, सुनो! यह सच है:
औरत होना इस सृष्टि का सबसे मुश्किल काम है!!!

 
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