यह दश्त-ए-ख़्वाब कि अब कोई भी सदा न करे
वह मेरे साथ रहे और इल्तिजा न करे
यह संग-ए-दिल है कि अश्कों की धार भी जिस पर
असर करे तो करे, पर कभी वफ़ा न करे
मैं उस के हिज्र का क़ैदी हूँ बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता का
वह मेरे ज़ख़्म पे अब कोई भी दवा न करे
मैं अपनी ज़ात के ज़िंदाँ में दफ़्न हूँ कब से
वह आ के देख भी ले पर मुझे रिहा न करे
वह हर्फ़-ए-तल्ख़ जो लिखे थे ख़ून-ए-दिल से कभी
ख़ुदा करे कि उसे अब कोई पढ़ा न करे
यह अक्स-ए-ख़्वाब जो टूटी हुई कोई शै है
वह मेरे सामने अब आइना-नुमा न करे
यह हर्फ़-ए-आख़िरी तहरीर कर दिया 'अंजुम'
"ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे"