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"ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे"

                
                                                         
                            यह दश्त-ए-ख़्वाब कि अब कोई भी सदा न करे
                                                                 
                            
वह मेरे साथ रहे और इल्तिजा न करे

यह संग-ए-दिल है कि अश्कों की धार भी जिस पर
असर करे तो करे, पर कभी वफ़ा न करे

मैं उस के हिज्र का क़ैदी हूँ बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता का
वह मेरे ज़ख़्म पे अब कोई भी दवा न करे

मैं अपनी ज़ात के ज़िंदाँ में दफ़्न हूँ कब से
वह आ के देख भी ले पर मुझे रिहा न करे

वह हर्फ़-ए-तल्ख़ जो लिखे थे ख़ून-ए-दिल से कभी
ख़ुदा करे कि उसे अब कोई पढ़ा न करे

यह अक्स-ए-ख़्वाब जो टूटी हुई कोई शै है
वह मेरे सामने अब आइना-नुमा न करे

यह हर्फ़-ए-आख़िरी तहरीर कर दिया 'अंजुम'
"ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे"

 
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3 घंटे पहले

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