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पहलगाम की पुकार

LOKESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहलगाम की वादी में, जहाँ सेबों की बगिया,
        
                                                    
                            
लिद्दर की लहरों में, गूँजती थी सृष्टि की कविता।
पर एक रात, चाँद छिपा, तारों ने मुँह फेरा,
पाक-भारत की जंग ने, वहाँ रक्त का रंग भरा।
न बम की गूँज थी, न बारूद का धुआँ,
पर दिलों में जल रहा था, दोनों मुल्कों का गुस्सा।
पहलगाम का वो बच्चा, जो खेलता था कागज़ की नाव,
उसके सपनों में अब, बस बस्तियों का है खौफ।
सीमा पर जवान खड़ा, माँ का पत्र लिए,
पाक का सिपाही भी, घर की याद लिए।
दोनों की आँखों में, एक ही सवाल उभरता,
"क्यों ये जंग, जो बेकसूरों को मरता?
"पहलगाम की मिट्टी, अब भी पुकार रही,
"ऐ इंसान, तू क्यों भूल गया अमन की गली?"
न जंग से जीत मिले, न हथियारों से सुख,
प्यार की एक चिंगारी, जला दे सारा रुख।
तो आओ, दोनों मुल्क, मिलकर गाएँ गीत,
पहलगाम की वादी में, फिर बने प्रीत।
सीमा पर न बँटे दिल, न बँटे इंसान,
हिंदुस्तान-पाकिस्तान, बने एक जहान।
एक वर्ष पहले
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