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ग़ज़ल: दूरियां,मजबूरियां औ' साथ ये तन्हाईयाँ

L.J. Bhagia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            Dr.Bhagia 'Khamosh'
        
                                                    
                            
बहर: 2122 2122 2122 212

दूरियाँ,मजबूरियाँ औ' साथ ये तन्हाईयाँ
किस क़दर वीराँ हुआ है आज मेरा आशियाँ

दूर रहकर भी रहे हैं साथ वो माँ बाप के
बेटों से बेहतर निकलती है अभी ये बेटियाँ

कौन जाने वक़्त कैसा कल यहाँ पर आयेगा
तीख़ी कुछ होने लगी है बच्चों की किलकारियाँ

रोज़ मुझको आइने में दिखता है दुश्मन मेरा
अक़्स मेरा ही उड़ाता है मेरी अब धज्जियाँ

जिस तरफ़ भी देखते हैं ख़ौफ़ का माहौल है
हो रही है फिर कोई क्या जंग की तैयारियाँ

प्यार है दिल में सभी के, है मगर इक क़ैद में
दिल के तालों की मुझे मिलती नहीं है चाबियाँ

प्यार की रुसवाईयाँ सब भूल जाते हैं यहाँ
बस यही दिखला रही है बज़्म की रानाइयाँ

याद आई है मुझे अपने पुराने यार की
और उस पर तारी है ये शाम की तन्हाईयाँ।

देखकर बरहम- मिज़ाजी फिर मेरे महबूब की
हो गयी ख़ामोश ख़ुद ही प्यार की शहनाइयाँ

लूटकर दिल को मेरे ही माँगते थे दिल मेरा
अब समझ आने लगी है उनकी वो बदमाशियाँ

सतहे- दिल पर ही रहा है प्यार तेरा ऐ सनम
माप ली दिल ने मेंरे भी दिल की सब गहराइयाँ

हम बड़े होते रहे हैं, दिल मगर बच्चा रहा
फिर दिले- 'ख़ामोश' ने की है वही नादानियाँ
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4 वर्ष पहले
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