मैं श्रमिक हूं
इस शहर का अहम घटक हूं
मैंने ही तो खड़ा किया है इस शहर को
मेरे समक्ष इसकी एक एक दीवार
एक एक रास्ते, पुल, सब वे,
ऊंची, गगनचुंबी इमारतें बनी है
छोटा था, पोली सी थीं बाहें
अभी दाढ़ी मूंछ निकली ही तो थी
कि निकल आए थे हम इस रस्ते
रोजगार की तलाश में, घर बार छोड़
इक बेहतर कल का स्वप्न
आंखों में संजोए,
पत्थर तोड़ने से लेकर, सीमेंट घोलने तक
ईंट जोड़ने से लेकर प्लास्टर करने तक
वो लकड़ी के फट्टे पर रस्सी के सहारे लटकते, पोताई करने तक
गट्टर का कचरा, कारखानों का धुआं
दरख्तों से दरीचों तक का सफर
नल की टोटियों का रहस्य
बड़ी कढ़ाई में कलछी चलाना
बड़े भांडों बर्तनों की सफाई
सूखी अंतड़ियों पर भी
ढाबों में खाना परोसना
जो मिला खा कर
कभी फुटपाथ तो कभी
एक कोठरी में पारी में सो कर
चंद पैसे बचा गांव भेजना
कब हाथों की नसें उखड़ कर
बिखरने लगी पता ही नहीं चला
मां कहती थी गेहुंआ रंग है
पर तप कर काला सोना हो गया
देखते देखते ये शहर बड़ा हो गया
मेरे सामने ये शहर खड़ा हो गया
एक शहर से दूसरा शहर
बसाते चले गए
हम श्रमिक ही रहे
पीढ़ी दर पीढ़ी
शहर दर शहर
कुछ अपनी मजबूरी
गांव में रोजी ना रोटी
कुछ नए शहर का रोमांच
नए हुनर की तलाश
दाव पे लगा दिया जिंदगी तमाम
आज जब अपने बनाए रस्ते पे
उल्टे पांव घर जा रहा हूं
ये रस्ते भी अनजाने से लगते हैं
और मैं कुछ हारा सा
कई शहर बसा दिए
मेरा देश संवर गया
मैं आज भी हर जगह प्रवासी
पराया सा रहा
लौटूंगा शायद कल भी
पर शायद अब वो आस ना होगी
आंखों में सतरंगी सपने
कुछ खास ना होंगी
घटक तो हूं मैं
पर अपनी मजबूरी का
इस बार कुछ समझदार
शायद मैं भी बनूंगा
ना प्रवासी बनूंगा, ना पराया रहूंगा
व्यवसाय करने आऊंगा, व्यवसाई बनूंगा
व्यवसाई श्रमिक बनकर
नया इतिहास रचूंगा
एक आवाज़ बनूंगा।
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