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किताबी कीड़ा

Laxman Rajput

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किताब ला धरके बइठे रहिथे,
        
                                                    
                            
ज्ञान के गंगा बहाथे।
कोनो बात पूछ देबे त,
पन्ना पलट-पलट के बताथे।

गुरुजी पूछिन—“बता बेटा,
धान कब बोए जाथे?”
बोले—“सर, किताब म लिखे हे,
मानसून म बोए जाथे!”

गुरुजी हँसके पूछिन फेर—
“खेत म पानी केकर देबे?”
बोले—“ए बात तो किताब म नइ हे,
किसान ल पूछ के कहिबे!”

गर्मी म पंखा बंद होगे,
बिजली घलो नइ आय।
किताबी ज्ञानी कहिथे—
“ऊर्जा संरक्षण होवत हे, चिंता काबर भाय!”

भूगोल म दुनिया घूम डारे,
नक्शा म देश चिन्हाथे।
अपन गाँव के रद्दा पूछव,
मोबाइल निकाल के देखाथे।

अर्थशास्त्र म भाषण देथे—
“बचत करना चाही।”
तनखा मिलते बाजार जाके,
कहिथे—“आज डिस्काउंट भारी!”

विज्ञान म बताथे सबला—
“स्वच्छता बहुत जरूरी।”
अपन कमरा देखव त लगथे,
कचरा विभाग के पूरी!

किताब के ज्ञान बुरा नइ हे,
ज्ञान के वो भंडार।
फेर जिनगी के पाठ बिना,
अधूरा हे व्यवहार।

किताब पढ़व, खूब पढ़व जी,
ज्ञान बढ़ावव रोज।
फेर किताब के बाहर घलो,
थोड़ा जिनगी पढ़व खोज!
एक महीने पहले
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