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भगवा — एक ध्वज नहीं, एक साधना

Lara Upadhyay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भगवा — एक ध्वज नहीं, एक साधना
        
                                                    
                            

जब प्रातः की पहली किरण
धरती के माथे को चूमती है,
तब शाखा के शांत प्रांगण में
एक केसरिया आभा झूमती है।

वह केवल वस्त्र नहीं आकाश का,
न केवल रंगों की रेखा है,
उसमें युगों की तपती साधना,
ऋषि-परंपरा की लेखा है।

न वह सिंहासन माँग रहा,
न अपने लिए सम्मान,
मौन खड़ा वह सिखलाता—
पहले राष्ट्र, बाद में अभिमान।

स्वयंसेवक जब शीश झुकाता,
ध्वज कुछ कहता नहीं,
पर भीतर कोई स्वर उठता—
“सेवा से बड़ा धर्म नहीं।”

कदम मिलें तो केवल पथ पर
नहीं, हृदय भी जुड़ते हैं,
एक ध्वज के नीचे आकर
भेद पुराने मिटते हैं।

मिट्टी की हर मुट्ठी में
माँ का स्पंदन पहचानो,
अपने सुख से ऊपर उठकर
कर्तव्य का दीप जलाओ।

भगवा! तेरी लौ में जैसे
अहंकार स्वयं गल जाता,
जो तुझसे जीवन सीख ले
वह देना ही सीख पाता।

तू विजय का मद नहीं सिखाता,
तू त्याग का गीत सुनाता,
गिरकर फिर उठने वाले को
कर्तव्य-पथ पर ले जाता।

नभ में जब तू लहराता है,
मन में प्रश्न जगाता है—
“भारत को क्या दे सकते हो?”
और अंतर्मन उत्तर पाता है—

तन से सेवा, मन से करुणा,
वाणी में मधुर विचार,
कर्म बने राष्ट्राराधना,
यही हो जीवन का आधार।

हे भगवा! तू मौन गुरु है,
तेरा मौन पुकार बने,
हर स्वयंसेवक के जीवन में
भारत का संस्कार बने।

न तेरा गौरव शब्दों में है,
न केवल तेरी शान में,
तेरा सच्चा अर्थ दिखाई दे
जब सेवा हो इंसान में।

तू लहराता रहे गगन में,
हम भीतर उजियारा करें,
माँ भारती के चरणों में
अपना जीवन अर्पित करें।

ध्वज रहे ऊँचा—भाव रहे ऊँचा,
ऊँचा रहे हमारा कर्म;
भगवा केवल ध्वज न रहे—
बन जाए जीवन का धर्म।

~ लारा उपाध्याय
2 महीने पहले
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