जी करता है तेरी गोद में,
फिर से मैं छुप जाऊं मां।
दुनिया के सब दर्द भुलाकर
पास तेरे आ जाऊं मां ।
प्रेम तेरा सींचे मेरा मन,
बदली बन बरसा दे मां।
शुष्क मन के उपवन में,
फिर से पुष्प खिला दे मां।
मेरे लिए मन्नत का धागा,
मंदिर जाके बांधे मां ।
ख्वाब मेरे करने को पूरे,
आधे - आधे बांटे मां ।
चेहरा मेरा रोज़ ताकती,
आंखों को पढ लेती मां ।
दर्द छुपाकर अपने कहानी,
रोज़ नई गढ़ देती मां ।
उम्मीदों की आहुति दे,
मन मसोस कर रहती मां।
हंसते - हंसते जाने कितनी,
बातों को सह लेती मां।
- ललिता पाठक