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नज़्म-ए-नब्ज़

Lalit modi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घनी रातों में अब लोग मशाल लिए नहीं मिलते,
        
                                                    
                            
जलती चिता मिल जाती है, पर दिये नहीं मिलते ।।

ग़र भीड़ में रहा तो एक दिन मैं भी कुचला जाऊंगा,
मुझे इनसे किनारा करना है पर हाशिए नहीं मिलते ।।

तेरे मयस्सर ना होने से ज्यादा कुछ तो नहीं बिगड़ा ,
बस इतना है अब ग़ज़ल लिखूं तो काफिये नहीं मिलते ।।

मुझसे तो तुम जीत गई पर ये जमाना भरा हुआ,
हर बार यहाँ मुझ जैसे ही नौसिखिए नहीं मिलते ।।

जख्म सहने के शौक ने ढेरों रकीब पाल रखे हैं,
मिल जाते हैं जख्म लेकिन , तेरे जरिए नहीं मिलते ।।

सूने बिस्तर की सजावट में ही राते कटती पर,
हर बार यही होता है , मुझको तकिये नहीं मिलते ।।

शायद फिर अंजाम ही उस महायुद्ध का और था,
ग़र धरती को रश्मिरथी के पहिये नहीं मिलते ।।

--ललित मोदी "सारथी""


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