आदमी हूँ तो मोहब्बत नहीं करोगी,
मेरी जेब से मुझे कतरा कतरा करोगी,
दो घर भी है, खुश्बू भी है, हुस्न ओ अदा भी है,
इतने श्रृंगार का क्या करोगी,
ये जेवरात, ये नगीने, ये साड़ी,
काजल बिंदी और फिर भी,
घूंघट में चांद का क्या करोगी,
मेरी तरह भी कभी इंतजार करोगी,
शक्ति भी हो संबल भी हो,
भावनाओं का धैर्य धारण भी करोगी,
एक ही तन में इन सबका क्या क्या करोगी,
पर मैंने मोहब्बत सीखी है,
जो तुमसे करनी है,
पूछ रहा हूँ मिलन का क्या करोगी।।
- ललित दाधीच