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"पक्षपात"

Lakshman Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहने को लोकतंत्र है, हम सब स्वतंत्र हैं,
        
                                                    
                            
पर मानसिकता वही, हम कितने परतंत्र हैं!
संविधान की बातें हैं, समता की सौगातें हैं,
मंच से जो कहते हैं, वो केवल बातें हैं।
टेंडर निकलता है, नारा लगता है -
आओ, सब भाग लो!
पर भीतर ही भीतर सब तय होता है,
अपनों का ही भाग्य यहाँ जगता है।
मंच हमारा है, माइक हमारा है,
गाने वाला भी अपने घर का ही सितारा है।
आज मैं गाऊँगा,
कल पत्नी मेरी गाएगी,
फिर बेटा गाएगा,
फिर बिटिया सुर सजाएगी।
सुर लगे न लगे, ताल टूटे या जुड़े,
तुम्हें तो सुनना है, तुमने ही तो चुना है,
ईवीएम की उंगली से तुमने जिसे बुना है,
उसी के गीत पर तुम्हें वाह-वाह करना है!
-लक्ष्मण झा 'परिमल
एक दिन पहले
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