आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"पक्षपात"

                
                                                         
                            कहने को लोकतंत्र है, हम सब स्वतंत्र हैं,
                                                                 
                            
पर मानसिकता वही, हम कितने परतंत्र हैं!
संविधान की बातें हैं, समता की सौगातें हैं,
मंच से जो कहते हैं, वो केवल बातें हैं।
टेंडर निकलता है, नारा लगता है -
आओ, सब भाग लो!
पर भीतर ही भीतर सब तय होता है,
अपनों का ही भाग्य यहाँ जगता है।
मंच हमारा है, माइक हमारा है,
गाने वाला भी अपने घर का ही सितारा है।
आज मैं गाऊँगा,
कल पत्नी मेरी गाएगी,
फिर बेटा गाएगा,
फिर बिटिया सुर सजाएगी।
सुर लगे न लगे, ताल टूटे या जुड़े,
तुम्हें तो सुनना है, तुमने ही तो चुना है,
ईवीएम की उंगली से तुमने जिसे बुना है,
उसी के गीत पर तुम्हें वाह-वाह करना है!
-लक्ष्मण झा 'परिमल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर