हर डाल पर एक उल्लू बैठा है,
अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या कहिए?
कहाँ-कहाँ से फूट पड़ी है,
इस अव्यवस्था को क्या कहिए?
व्यवस्थापक ही व्यवस्था को जब,
अपने हाथों से चरमराता है,
सबकी बागडोर फिर अनायास,
उसी के हाथों में आ जाता है।
मन किया तो फरमान आया,
SIR का बिगुल बजवा दिया,
मौका देख कर फिर उसी ने,
ED का छापा भी लगवा दिया।
यह तो अद्भुत नाट्य-मंच है,
हम ही गायें, हम ही नाचेंगे,
सुर-ताल का ज्ञान नहीं है फिर भी,
हम ही गायक कहलायेंगे।
कंठ में स्वर हो या न हो,
क्या कोई फ़र्क पड़ता है,
मंच तो अपना है ही यारो,
मेडल पर हक मेरा रहता है।
दर्शक झूमे या मुँह बिचकाये,
ताली तो पिटवानी ही है,
मीडिया पूछे या न पूछे,
धूम तो मचानी ही है।
करा लो तुम इम्तिहान सारे,
सूची में मेरे ही लोग आयेंगे,
जहाँ प्रश्न-पत्र सारे छपते हैं,
वहाँ निशाँ मेरे पाये जायेंगे।
हम तो यंत्र हैं सदियों पुराने,
बस दर्शक, ताली बजाने वाले,
आप भले कुछ भी सोचो,
ऐसे ही हम बनते हैं दिलवाले।