विज्ञापन

एक प्रेमी

kuldeep yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            मुझे खुद से शिकायत है , कि मैं कुछ कर नहीं सकता |
        
                                                    
                            
बिना तेरे , मैं इस जहां में रह नहीं सकता ||

बड़ी मुस्किल से पाया है , तुझे मैंने |
मैं चाह-कर के भी , अब तुझको भुला नहीं सकता ||

देखकर दीदार तेरा, मुझको अब नींद आती है|
तू चाहे जहाँ रहे जहां में , फिक्र तेरी सताती है ||

दूरियां चाहे बढे़ जितनी, मैं फिर भी पास तेरे हूं|
तू मुड़-कर देखना परछाईं में , मैं तेरे पास हूं ||

मुझे खुद से शिकायत है , कि मैं कुछ कर नहीं सकता |
बिना तेरे , मैं इस जहां में रह नहीं सकता ||

बड़ी आशा मुझे तुझसे , तू मेरे पास ही रहना |
खिले जो फूल , उनको तू खिलाये ही रखना ||

बड़ी तकलीफ़ होती है , जब तू दूर है होती |
बिस्तर चाँद पर हो अपना, पर आँखों में नींद ना होती ||

मुझे खुद से शिकायत है , कि मैं कुछ कर नहीं सकता |
बिना तेरे , मैं इस जहां में रह नहीं सकता ||

कुलदीप

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all