जहां कुचल दिया मुझ बीज को तुमने, उस मिट्टी से मैं पनपा हूं,
संघर्ष की आग में जला हुआ मैं, अपने लक्ष्य को पाने का जन्मा हूं l
जब धरती में दफनाया मुझको, न उम्मीद किसी को थी,
बढ़ ना जाऊं कहीं मैं आगे, यह कोशिश लोगों की थी,
सूखी बंजर उस जमीन में मुझको , निर्दयता से कुचल दिया,
संबल के नाम पर इस दुनिया ने, हर पल पर मुझसे छल किया l
आशा थी लोगों से मुझको , केवल भावात्मक -मानसिक समर्थन की ,
जो पानी की तरह कर , नम जमीन को, करती नव जीवन का प्रवर्तन भी ,
न रिश्तेदार न कोई व्यक्ति , मुझको प्रेरणा देने आया ,
पर तुलना तानों के वारों से, आत्म विश्वास मेरा गिरवाया ,
तानों... की चोटें खा खाकर, जब बढ़ना मैंने सीख लिया ,
स्वाभिमान की रक्षा में, दर्दो से जूझना सीख लिया ,
बढ़ता देख मुझे आगे , कई बार मुझे दफनाया है ,
फिर टूटी पत्ती और तन के संग मैंने , फिर से खुद को अपनाया है l
जीवन पाने की इक तलाश में, लोगों से साथ की एक आस में ,
संघर्ष के मेरे अंधकार में, था ही नही कोई मेरे साथ में,
जिद्दी बनके फिर भी मैं , पौधे के रूप में पनपा हूँ,
सीमित संसाधन होने पर भी, नये रूप मे जन्मा हूँ ,
बस मात पिता और ईश्वर के आशीष ने मुझे, बढ़ाया है,
और मेहनत करके संघर्षों से, जीतना मुझे सिखाया है,
इक यही विश्वास सहारा था जो, मेरे अंतर्मन में समा ग़या,
और लक्ष्य को पाने मेरे मन में, भयंकर तपती ज्वाला जला गया,
और आत्म विश्वास अडिग बनाकर, मुझे विशाल वृक्ष सा बना गया l
देख वृक्ष की यह विशालता, आज फिर उन लोगों ने मुझे गले लगाया है,
फिर बन ना पाए नया वृक्ष कोई , यह सोच कर जिन्होंने,
शायद आज फिर एक नया बीज दफनाया है,
पर भूल रहे ये लोग फिर से, यह नया बीज भी बही दोहराता है,
इसी तरह इन लोगों से मुझको अपना , दफनाया जाना याद आता है l
इसीलिए दोहराकर मैं इन लोगो से, मैं बस बार बार यही कहता हूं कि,
जहां कुचल दिया मुझ बीज को तुमने, उस मिट्टी से मैं पनपा पनपा हूँ,
संघर्ष की आग में जला हुआ मैं, अपने लक्ष्य पाने जन्मा हूं l