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मिलीभगत पार्ट

Kshitiz Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी लोग इतने पास होते हैं,
        
                                                    
                            
कि उनके हाथ मिलते हैं चुपके-चुपके।
चेहरे पर मुस्कान रहती है,
पर मन में कोई साज़िश चलती रहती है।

दोस्ती का नाम लेकर बैठते हैं साथ,
बातचीत में छुपा देते हैं अपने इरादे।
सामने एक बात कहते हैं,
पीठ पीछे दूसरी बात फुसफुसाते हैं।

तुम भरोसे में आँख मूँदकर सो रहे होते हो,
वो रात-रात भर कुछ रचते रहते हैं।
तुम्हारी कमज़ोरियाँ ध्यान से देखते हैं,
फिर उन्हें हथियार बना लेते हैं धीरे-धीरे।

तुम्हारे साथ हँसते हैं,
पर उस हँसी में हिसाब छुपा होता है।
जब तुम्हारी पीठ मुड़ती है,
तब खुलता है असल खेल का भेद।

रिश्ते बाहर से पवित्र दिखते हैं,
अंदर से सौदेबाज़ी के अड्डे बने होते हैं।
एक ओर प्यार का नाटक चलता है,
दूसरी ओर स्वार्थ की मिलीभगत।

कोई तुम्हें बचाने का दावा करता है,
पर असल में तुम्हें बेचने की तैयारी में होता है।
कोई कंधे पर हाथ रखता है,
पर उसी हाथ में छुरा छिपाए रहता है।

समय आता है जब पर्दा हटता है,
तब पता चलता है कौन था सच्चा साथी,
और कौन था साज़िश का हिस्सा।
मुस्कानें टूट जाती हैं,
भरोसा मिट्टी में मिल जाता है।

पर याद रखना,
जो आज तुम्हारे विरुद्ध साज़िश रच रहे हैं,
कल स्वयं उसी जाल में फँसेंगे।
मिलीभगत कभी एकतरफ़ा नहीं रहती,
वो लौटकर उसी को काटती है
जो उसे पालता-पोसता है।

अँधेरे में मिलने वाले हाथ,
उजाले में कभी नहीं बच पाते।
सच चाहे देर से आए,
पर आता ज़रूर है।
और जब आता है,
तो मिलीभगत की सारी दीवारें
एक-एक करके ढह जाती हैं।
~ क्षितिज श्रीवास्तव
15 घंटे पहले
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