बेखूब वफ़ादारी
उठ चले वो इस तरह
गैरत दिखा करके
उनके आगे अपनी वफ़ा की
किमत क्या पेश करते
हमने सोचा नहीं बस निभा दी
बेखूब वफ़ादारी
क्या उनके आगे अपने जमीर की
रूसवत भी अदा करते