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ग़ज़ल

Krishna Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मरहम असर नहीं करता ज़ख्म क़ो कैसी सज़ा हों गई
        
                                                    
                            
जिंदगी के बदले में क्यूँ जहन्नुम की आग अता हों गई

इश्क़,मुहब्बत,प्यार,वफ़ा ये सब नैमत हैं उपरवाले की
दिली अहसास कबूले मैंने तों नैमत कैसे बद्दुआ हों गई

ये जो ख़ूनी रिश्ते हैं अब फ़क़त नाम के नज़र आते हैं
आजकल इनमे मुहब्बत तों जैसे कब की विदा हों गई

बात-बात पऱ मुँह मोड़ लेते हैं अपनी अना के नाम पऱ
कोई बता दे मुझकों ये मुहब्बत की कब सें अदा हों गई

तुम कभी जो मिलो मुझकों तों नज़र-अंदाज़ कर देना
ये जो मुहब्बत हैं ना आँखों में,रवायत में कज़ा हों गई

चंद छिंटे मुहब्बत के ग़र मिल जाए तों सांस आए ज़रा
तुम्हें क्या ख़बर "कृष्णा" तुम्हारी कुर्बत मेरी दवा हों गई..
-कृष्णा शर्मा
5 महीने पहले
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