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प्रखर प्रज्ञा प्रवाह:-

krishna murari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रखर चेतना, प्रखर वेदना,
        
                                                    
                            
प्रखर हुई यह रात नयी है।
प्रज्ञा के प्रभूत उद्भव से,
सोच -सोच जज़्बात नयी है।।१।।

नहीं कहीं अनमनी हिकारत,
नहीं किसी की कोई शरारत।
यथा भाव सब चलते रहते,
यह भी तो कोई चाल नयी है।।२।।

अभी -अभी तो मिले हुए थे,
फूल सभी जो खिले हुए थे।
माली का झुकना डाली सम,
फूल -फूल की बात नयी है।।३।।

गांव -गांव में पड़े हैं झूले,
अश्वस्थ नीम बरगद हैं फूले।
प्राची से चल पड़ी बयार,
पुरुवा की ललकार भयी है।।४।।

गावें कजरी और मल्हार,
संस्कृति की यही पुकार।
गुड़िया संग बुढ़िया है नाचे,
नवारास की रास नयी है।।५।।

सावन की सिन्दूरी सन्ध्या,
इन्द्रधनुष के मान बढ़ाए।
नियति की यह छटा मनोहर,
लगती जैसे नयी नयी है।।६।।

शिव- शक्ति का है आराधन,
रिमझिम सावन का यह नर्तन।
कहीं वृष्टि अतिवृष्टि कहीं पर,
मुखरित आंखें चार भयी है।।७।।

दीन यहां पर कौन बताए,
प्रज्ञा सबको राह दिखाए।
अन्तरमन का यह अनुशीलन,
दीन बन्धु की कृपा भयी है।।८।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय
 
एक महीने पहले
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