जिस छोर पर आकाश चूमता नीम
उसी छोर से नजर आती
उसके आलिंगन में रहती अमृता।
कही टहनियों पर फेरे लेती
कही उलझती पत्तियों से
चढ़ती बढ़ती साथ साथ
नीम संग खेलती झरकती अमृता।
लियें नीम के गुण पुत्री बन
कभी झूमे संग मित्र बन
कभी लरकती है नीम से
नीम को सर्वस्व स्वीकारती अमृता।
जनाब! यह भी नीम ठहरा
प्रेम-आंचल इसका भी अति गहरा
सींच पोषण पाली है इसने,
अपनी प्रिय अमृता।
यू तो आसरा यह बहुतों का
है घर, पंछी अनेकों का
मगर लगाव अधिक है तनिक-थोड़ा
नीम संग झूमती अमृता।
नीम तो दवाई कड़वी है,
निमोली भी कुछ खास नहीं है,
फिर कहा से कौनसी मिठास लाया नीम
जो सदा साथ रही अमृता।
- कृष्णा बजाज