मातृभाषा अपनी है,
परंतु मुझे लगती पराया है।
विश्वगुरु, विश्व गुरु की
कमजोरी बनती जा रही अंग्रेज़ी है।
मैं तो दुखी हूँ,
शब्द तो बहुत हैं,
परंतु क्या-क्या लिखूँ,
बात बड़ी है,
समय कम।
संस्कृत, हिंदी, लोकभाषाएँ
होती जा रही छिन्न हैं।
जहाँ गूँजते थे गायत्री मंत्र,
जहाँ पढ़ते थे गीता शास्त्र,
वो अब प्रेम कहानियों का दीवाना है।
शब्द बहुत हैं,
परंतु समय कम है