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जज़्बातों

Komal Cs

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो इस कदर खेलते मेरे जज़्बातों से,
        
                                                    
                            
जैसे शबनम धूप से, और मैं पिघलता रहा।

जिसे समझा था अपना, वही अनजान निकला,
मैं हर बार उसी नाम से खुद को संभालता रहा।

मेरे दर्द को भी उन्होंने तमाशा बना दिया,
और मैं हर बार चुप रहकर भी बोलता रहा।

वक़्त ने हर मोड़ पर नई कहानी लिख दी,
मैं हर पन्ने पर अपनी ही रूह को ढूँढता रहा।

वो चले गए हवाओं की तरह बेपरवाह होकर,
और मैं उनके निशानों को दिल में संजोता रहा।

टूट कर भी मैं बिखर न सका पूरी तरह,
हर टुकड़े में अपना ही हौसला जोड़ता रहा।
— कोमल 
2 महीने पहले
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