आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जज़्बातों

                
                                                         
                            वो इस कदर खेलते मेरे जज़्बातों से,
                                                                 
                            
जैसे शबनम धूप से, और मैं पिघलता रहा।

जिसे समझा था अपना, वही अनजान निकला,
मैं हर बार उसी नाम से खुद को संभालता रहा।

मेरे दर्द को भी उन्होंने तमाशा बना दिया,
और मैं हर बार चुप रहकर भी बोलता रहा।

वक़्त ने हर मोड़ पर नई कहानी लिख दी,
मैं हर पन्ने पर अपनी ही रूह को ढूँढता रहा।

वो चले गए हवाओं की तरह बेपरवाह होकर,
और मैं उनके निशानों को दिल में संजोता रहा।

टूट कर भी मैं बिखर न सका पूरी तरह,
हर टुकड़े में अपना ही हौसला जोड़ता रहा।
— कोमल 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर