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शहदीली शीरीं ज़ुबान

Kishan Rajput

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             शहदीली शीरीं ज़ुबान से, उसने सॉरी बोल दिया।
        
                                                    
                            
रौंद के यूं फूलों से अरमां, मुझे वफ़ा का मोल दिया।।
हैं कतार में इतने आशिक़, देखके मैं तो लौट चला।
मेरी मुहब्बत को जानेमन किस दौलत से तौल दिया।।
देखा है राहे उल्फत में, यूं तो इश्क़े चलन रहा।
दीदारे दिलबर की खातिर,झट से घूंघट खोल दिया।।
कितने सुकूं में सारे मज़हब, मुख़्तलिफ़ रहे मिलकर के यहां।
किसने आकर स्वाद बिगाड़ा, क्यूं रस में विष घोल दिया।।
ख़ुद ही तुम इकरार किए हो, ऐन वक्त पर मुकर गए।
जो देना था, दिया नहीं पर, केवल ढोलम पोल दिया।।
एक कसावट अनुशासन की,"पत्थर"कितनी मुश्किल है।
जिसको तुमने कसना चाहा, उसने उतना झोल दिया।।

 -के.पी.एस.राजपूत
2 वर्ष पहले
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