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हंसना ये सोच

Khushi Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब कभी गुजरना शाम ढले दोबारा पगडंडी पर
        
                                                    
                            
हंसना ये सोच लौट आए वही शुरू में थे जहां पर

भोर भए जिस पेड़ तले खेल गए थें खेल कई निराले
देखना पलट के वो पेड़ कहेगा आ अब थकान मिटा ले

बस सुबह शाम का होगा फर्क
बाकी कुछ बदला नही यहां पर
हंसना ये सोच लौट आए वही शुरू में थे जहां पर

पहले राहें हंसते गाते कब बीत गई नही खबर लगी
लौटते वक्त थक चुके हैं पांव तभी ये दुस्कर तनिक लगी

लेकिन गले लगा है पुरानी बाते यादें
कहती है रुकना नहीं चले चलो यहां पर
हंसना ये सोच लौट आए वही शुरू में थे जहां पर

तो क्या हुआ गर घनी भीड़ में पुराने साथी छूट गए है
कोई फर्क नहीं गर अपने ढलता हुआ देख निकल गए है

कट जायेगी कुछ रुकते चलते ये डगर भी
मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं ये सफर
हंसना ये सोच लौट आए वही शुरू में थे जहां पर
एक घंटा पहले
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