यह 21-22 की उम्र भी क्या अजीब है...
कुछ के पास रोजगार है, तो कुछ रोजगार की कतार में हैं।
कुछ को परिणाम का इंतजार है, तो कुछ परीक्षा के लिए तैयार हैं।
कुछ अपनों के पास हैं, तो कुछ पराए शहरों में 'अपने' बना रहे हैं।
बस सब में एक चीज समान है—
सब जिंदगी की नाव को किनारे पर ले जाना चाह रहे हैं,
और इस रेस में, कुछ इस सफर का लुत्फ़ उठाना ही भूल जा रहे हैं।
और भूलें भी क्यों न?
सब मुसाफिरों की अलग-अलग नावें उन्हें बार-बार यह याद दिलाती जा रही हैं—
कि "तुमको सबसे पहले पहुँचना है उस पार!"
कुछ की नाव बड़ी है, तो कुछ की छोटी,
कुछ की लकड़ी की है, तो कुछ की तिनकों से बनी है,
और कुछ तो जहाज पर ही सवार हैं...
पर जाना सबको सबसे पहले उस पार ही है।
चलो मान लिया, पहुँच गए तुम सबसे पहले उस पार...
तो क्या बस यहीं थम जाएगी तुम्हारे सफर की रफ्तार?
जनाब, यह सफर है, जो चलता ही जाएगा और चलता ही आ रहा है—
स्कूल में पोजीशन, कॉलेज में सीजीपीए (CGPA),
नौकरी में प्रमोशन , बिजनेस में फायदा,
रिटायरमेंट की पेंशन और फिर तेरहवीं का खाना...
तो फिर किस किनारे की चाह रख रहे हो?
और किस रेस में दौड़े जा रहे हो?
चलते जाओ अपनी-अपनी रफ्तार से,
क्यों किसी और की रफ्तार से अपनी रफ्तार मिला रहे हो?