पैदा होते से वह पराई है,
फिर पराए घर से आई है।
बिना रंगों के, बिना कला के,
समाज ने एक तस्वीर बनाई है।
वह तस्वीर कहीं से काली है,
कहीं से मोटी है, कहीं से बहुत लंबी है,
कहीं अभी थोड़ी छोटी है।
कहीं से बोलती नहीं है, कितनी शांत है,
कहीं से कितना ज्यादा बोलती है
और इसको तो बोलने का ढंग ही नहीं है,
ऐसे थोड़ी ना कोई तस्वीर होती है।
कितने नाम दे दिए उस तस्वीर को,
किसी की मां है, किसी की बेटी है,
कवि की बहन है, किसी की दादी है।
"इसको हमने तो हर तरह की आजादी दे रखी है,
अब ना जाने निकम्मी तस्वीर और क्या चाहती है?"
आखिर क्या चाहती थी वह तस्वीर?
एक खुला आसमान हो, आजादी की उड़ान हो,
मनचाहा जीवन हो, खुद की एक पहचान हो, बस।
वह दाएं गई तो उसको रोका,
बाएं मुड़ी तो रास्ता मोड़ा,
टुकड़ों में बिखर गई इतनी बेदर्दी से उसको तोड़ा।
भरोसा करे भी तो किस पर?
भरोसे लायक समाज ही नहीं छोड़ा।
करने को कर लेती वह सब कुछ,
तुमसे बेहतर, तुमसे अच्छा,
पर तुमने उसको किसी लायक माना ही नहीं।
बेरंग कह दिया तस्वीर को बड़े ताव से,
उसके असल रंगों को तो तुमने पहचाना ही नहीं।
अब क्या चाहते हो उस तस्वीर से?
उसका हंसना बुरा लगा, उसने मुस्कुराना छोड़ दिया,
उसका सुनना बुरा लगा, उसने बताना छोड़ दिया।
अब मत मांगो उस तस्वीर से और कुछ भी,
उसने अपने जीने का एहसास जताना छोड़ दिया।?