है दरिया, है समुन्द्र सामने फिर भी
है कोई प्यास आँखों में
हर रोज टूटते है ना जाने
कितने सपने
फिर भी जिन्दा है कोई खाब आँखों में
ये नग्मे, ये तराने तो सब लगते है
बेसुरे से
मैंने मीठा सा रखा शेष कोई राग आँखों में..
ना बोले, ना बतलाये गुमसुम सी
रहती है चुप-चुप रहती है
है कोई तो गहरा राज आँखों में
चलो अब बहुत हुई रुसवाई इन
सवालों का अब जवाब भी दो
कब तक रखोगी छुपाकर
ये जज़्बात आँखों में