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छब्बीस पल के इस रण में

Kavi abadh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भोर जगी ,जगे उलहने,एक विजयश्री की गूंज हुई,
        
                                                    
                            
प्रक्षेपास्त्र से पाक पराजित,नभ से भी हुंकार हुई।

भारतवर्ष लगा संवरने, पूरव से लाली उदित हुई,
जल भर लोटे से, अर्पण करती नारी प्रकट हुई।।

अस्तबल में हिन हिन हंसि, अरि मुख मलीन फिर से,
कपट व्यवहार किए हैं,इस रिपु ने बीती सदियों से।।

नारी सिंदूर गर्जना कर बैठा, हिला विष्णु का लोक,
अर्नब गोस्वामी ने पहलगाम की पीड़ा गाई शिवलोक।

मुख से आह आंसू फिसल गिरा, दुखियारी प्रकृति का,
फटने लगा धरातल, जब उजड़ा सिंदूर सुहागिन का ,।

रक्त चरित की रेखा खिंचती आई भारत की छाती पर,
याद नहीं है तुमको एक रावण मारा था लंका जाकर।।

नारी के सत् बल से ही , जलधि ने पथ अपना खोला था,
पाक की औकात है क्या,सतियो को हल्के में तौला था।

दंड विधान के आगे,प्रलय की हलचल थमी नहीं थी,
अति लज्जा के कोलाहल में, तेरी संसद ऐंठ रही थी।

हे विश्वदेव ये प्रश्न अचानक क्यों मुझसे पूछ लिया,
ब्रह्मोस की एक गर्जना से, क्यों मेरे मंत्रों को रोक दिया।

कहीं अंधकार में अग्निअस्त्र, सूरज की गर्मी उगल न दे,
आतंकी भू_भंग हो,प्रलय वज्र से शत्रु शमन करने दे।

विकल हो वो कांपा था,छब्बीस पल के इस रण में।
आतंकी सर्प फंस गया हो,ज्यों नागफनी के जंगल में।।

ऐसी विषम परिस्थिति में,अब वो विश्व पुकार रहा था,
अपने अंतर्मन में वो मन ही मन कांप रहा था।।

हे विश्वदेव अब तुम इन आतंकी सर्पों का संहार करो,
ये विश्व शांति से रह ले,ऐसा कोई व्यवहार करो।।
-अवध बिहारी मिश्र
एक वर्ष पहले
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