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गीत धृष्ट छंद

कवि Suraj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह अनबूझ पहेली बूझो,क्या जीवनदर्शन हो।
        
                                                    
                            
फौजी सरहद से लौटें तो,उनका अभिनंदन हो।।

घर आँगन को छोड़ चलें जब, बहें नयन से जल है।
पर्वत जैसा धैर्य दृढ़ है,उर में उथल-पुथल है।।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाए,उनका नित वंदन हो ।
फौजी सरहद से लौटें तो,उनका अभिनंदन हो।।

देशभक्ति की गाथा गाकर ,फौजी का मान करें।
प्राण रहें जब तक तन-मन में,जय-जय का गान करें।।
देश प्रेम का पाठ पढ़ाते, ऐसा ही जीवन हो।
फौजी सरहद से लौटे तो,उनका अभिनंदन हो।।

राम कृष्ण की इस धरती पर,कभी द्वेष ना करना।
बुद्ध सिखाते युद्ध न करना,शांति बनाए रखना।
भारत माँ की रक्षा खातिर ,जीवन अब अर्पण हो।
फौजी सरहद से लौटें तो ,उनका अभिनदंन हो ।।
-सूरज तिवारी
2 महीने पहले
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