यह अनबूझ पहेली बूझो,क्या जीवनदर्शन हो।
फौजी सरहद से लौटें तो,उनका अभिनंदन हो।।
घर आँगन को छोड़ चलें जब, बहें नयन से जल है।
पर्वत जैसा धैर्य दृढ़ है,उर में उथल-पुथल है।।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाए,उनका नित वंदन हो ।
फौजी सरहद से लौटें तो,उनका अभिनंदन हो।।
देशभक्ति की गाथा गाकर ,फौजी का मान करें।
प्राण रहें जब तक तन-मन में,जय-जय का गान करें।।
देश प्रेम का पाठ पढ़ाते, ऐसा ही जीवन हो।
फौजी सरहद से लौटे तो,उनका अभिनंदन हो।।
राम कृष्ण की इस धरती पर,कभी द्वेष ना करना।
बुद्ध सिखाते युद्ध न करना,शांति बनाए रखना।
भारत माँ की रक्षा खातिर ,जीवन अब अर्पण हो।
फौजी सरहद से लौटें तो ,उनका अभिनदंन हो ।।
-सूरज तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X